महान संगीतकार पंडित रविशंकर को नमन

विश्व में भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्कृष्टता के सबसे बड़े उद्घोषक पंडित रविशंकर का आज 96वां जन्मदिन है। सदी के सबसे महान संगीतज्ञों में से एक पंडित रविशंकर और सितार एक दूसरे के पर्याय हैं । यानि जहां पंडित रविशंकर की बात होगी वहां सितार होगा और जहां सितार होगा वहां पंडित रविशंकर होंगे।

काशी के पुनीत घाटों पर बीता बचपन

पंडित रविशंकर का जन्म धर्मनगरी काशी में 7 अप्रैल, 1920 को हुआ था। जन्म के शुरुआती दिन काशी के पुनीत घाटों और मां गंगा की अविरल धारा को देखते हुए बीता। शायद यही वजह है थी उनके वादन में गंगा की कलकल ध्वनि जैसी मिठास और संगीत साधना के जरिए पूरी दुनिया में शांति का संदेश समाहित था। बचपन धन-धान्य से संपन्न परिवार में हुआ था, पिता उच्च कोटि के बैरिस्टर थे। परिवार में हर समय कला और संगीत का माहौल रहता था।

पंडित रविशंकर का नर्तक से सितार वादन का सफर

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि शास्त्रीय संगीत के पितामह पंडित रविशंकर कला जगत में नर्तक के रूप में प्रवेश किए थे। उनके बड़े भाई पंडित उदयशंकर नृत्य करते थे, बड़े भाई को देखते-देखते उनके अंदर भी कला के प्रति लगाव बढ़ा। पंडित जी की आरंभिक शिक्षा गुरू उस्ताद अलाउद्दीन खां के संरक्षण में घर पर ही हुई। बाद में वो उस जमाने के महान कलाकारों जैसे- तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा खां, किशन महाराज और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर खां के साथ जुड़े रहे। 18 साल की उम्र होते-होते उनके अंदर संगीत के प्रति इतना लगाव बढ़ा कि नृत्य छोड़कर वो सितार बजाने लगे। किसी को क्या मालूम कि नर्तक से संगीतकार बने पंडित रविशंकर एक दिन दुनिया को सितार की धुन पर थिरकने को मजबूर कर देंगे।

कई विदेशी फिल्मों में है सितार की झंकार

पंडित रविशंकर की अंगुलियां जब सितार पर गतिमान होती थीं तो पूरा माहौल झंकारमय हो जाता था। उन्होंने ना सिर्फ हिंदुस्तान के लिए बल्कि कनाडा, यूरोप, अमेरिका और दुनिया के कई देशों की फिल्मों के लिए संगीत कंपोज किया। उनके संगीत से सुसज्जित फिल्म चार्ली, गांधी और अपू त्रिलोगी दुनिया भर में मशहूर हैं। अपू त्रिलोगी को महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने बनाया था।

सम्मान और पुरस्कार

ये सच है कि पंडित रविशंकर के कद और योगदान के आगे सारे पुरस्कार बौने पड़ जाते हैं। या यूं कहें कि खुद सम्मान भी अपने आपको सम्मानित महसूस करते हैं। उनके असीम योगदान के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के अलावा पद्म विभूषण, पद्म भूषण से नवाजा गया था। इतना ही नहीं पंडित रविशंकर को तीन बार ग्रैमी अवॉर्ड से भी नवाजा गया था। 1986 से 1992 तक वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे। आखिरी वक्त में वो अमेरिका गए थे वहीं के सेन डिएगो में 11 दिसंबर, 2012 को उनका निधन हो गया। राष्ट्रीय संपदा पंडित रविशंकर के निधन के साथ ही संगीत के एक युग का अंत हो गया। लेकिन उनकी प्रतिभा, कला और विनम्रता आज भी हमारे बीच मौजूद है।

 

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